ॐ साईं.
"एक सुखा पत्ता."
कई मुद्दत से कोई अरमान लिए,है दिल बोझल,
जाने कौन सा ख्वाब है जो ऑंखें,लिए है ओझल;
एक तड़प सी सिने में चुभती है कभी,
यूँ जैसे नासूर की कच्ची नोंक,उगी है अभी.
सुख गए वो पौधे,जो थे गिले हरे खेत कहीं,
आग सी हवा उड़ाती है,आखों में चुभकर रेत कहीं;
हर पल लगता है मानों, मिलों का अनकटा रास्ता,
जैसे तनहाइ को नहीं कोई,इस दुनिया से वास्ता;
एक सुखा पत्ता लेहेर आता है, मेरे पढाई मेज पर,
सुकून देता है यूँ,मिला न था कभी फूलों की सेज पर;
सबक देता है जिंदगी का,जो लिया टूटकर शाख़ से,
रुखी पलकों को गिलाता है,आंसू बहाकर आंख से;
यूँ जैसे उम्र गुजारी हो, बहार से पतझड़ तक,
नस-नसें बहाई हो,हरियाली से भूक-सुकड़ तक;
क्या केहेना चाहता है,कोई बोली हो तो समझें,
सरसराता है आगे,के कोई इसकी बातों में तो उलझें;
के फिर कोई थाम लें,जो इसे उम्मीद का एक कोना दिखें,
या उलटकर इसी की गिली नोंक से, बीते जिंदगी का पन्ना लिखें.
मेरे जले खून का कतरा,इसकी बची गिल से बने हर बूंद सियाही,
ऐ फलक,चाँद,तारों,उतरे अल्फाजों की रहेना तुम सबूत-ऐ-गवाही.
चारुदत्त अघोर(८/३/११)
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