ॐ साईं.
दिल
दिल आखिर दिल है,न ठुकराओ इसे इंकार से,
अरमानो से भारी ये,अदब करो इकरार से;
महसूस करो धड़कन जो कीमती है इस जन्नत से,
परों से गिरा ये पंख,है संभाला कई मुद्दत से...
जख्म-ए-रुह ये हवा की चुभन से,
फैलाये पंख तो,मिलाये गगन से,
कमसिन-ए-नादाँ ये,ब्कशो इसे इज्जत से,
परों से गिरा ये पंख,है संभाला कई मुद्दत से...
खयालो में खो के,उलझे बड़ी लगन से,
समाये तन से मन अपना,पूरी मगन से;
कभी दौड़े बेलगाम,कभी साँसे फ़ुरसत से,
परों से गिरा ये पंख,है संभाला कई मुद्दत से...
कलम-ए-स्याही उतारे कभी ग़ज़ल-ए-कलाम से,
चाहे जाना जहाँ,भागे उसी मक़ाम से;
हो हल्का कभी,या भारी जो उठे बड़ी मेहनत से,
परों से गिरा ये पंख,है संभाला कई मुद्दत से...
खिलाये बागों को,अपनी अदाओं के गुलशन से,
शबनमी बूंदें बरसाए,अपनी ही धड़कन से;
ख़ुदा-ए-तोहफा ये,रखो मुहोब्बत-ए-रहमत से,
परों से गिरा ये पंख,है संभाला कई मुद्दत से...
शायरी-ए-मौसिक़ी हो इसकी हर लफ्ज़ से,
कतर कतरा इश्क़-ए-लहू,बहे हर नब्ज़ से,
हो अदब-ए-अहसान,जो मिला है ख़ुदा की फितरत से,
परों से गिरा ये पंख,है संभाला कई मुद्दत से...
चारुदत्त अघोर.(९/२/११)
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