charudutta aghor


एक नाचीझ के कुछ रु-ए-अलफाज........
"खुशनसीब बन्दे है हम उस खुदा की बंदगी के..,
कुछ लफ्ज़-ऐ-अल्फाज़ पेश है इस जालिम जिंदगी के......!!!!!"

Thursday, February 17, 2011

"जिंदगी"


ॐ साईं
"जिंदगी"
क्यूँ अपने अल्फ़ाज से जिंदगी कलामती है हमें,
अपनी ही अदब से झुकाकर सलामती है हमे;
इस कदर अपनी शायरी में फ़नकारती है हमें,
अपनी ही पायल में उलझाकर झंकारती है हमें,
खुद के ही शायरी में कलामकर ग़ज़लती है हमें,
गजरे का फुल बनाकर क्यूँ मसलती है हमें;
अपने हमदम से मिलाकर क्यूँ बिछडाती है हमें,
खुद आगे दौड़ कर क्यूँ पिछडाती है हमें;
गले से कभी लगाकर बनाती है तावीज़ हमें,
तोड़कर कभी कहती है खुदा हाफिज़ हमें;
यूँ नेहलाकर जैसे बनाती है शबनमी हमें,
कभी भुलाकर बना देती है अजनबी हमें;
नूर-ऐ-बूंद बनाकर बहाती है सदियों में हमें,
तूफ़ान से टकराकर,घुमाती है वादियों में हमें;
क्यूँ हसती है खुद, कर के ख़फा हमें,
बेदर्दी से ठुकराकर ,करती है दफ़ा हमें;
अपनी ही कोशिशों में करती है नाकाम हमें,
ऐ जिंदगी कुछ तो रेहेम हो,की मिले कोई मक़ाम हमें....!!!
चारुदत्त अघोर.(१८/२/११)

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