charudutta aghor


एक नाचीझ के कुछ रु-ए-अलफाज........
"खुशनसीब बन्दे है हम उस खुदा की बंदगी के..,
कुछ लफ्ज़-ऐ-अल्फाज़ पेश है इस जालिम जिंदगी के......!!!!!"

Saturday, February 12, 2011

ॐ साईं
वो कैसी थी?
वो बहार-ए-चमन थी,
जो नजार-ए-गुलशन थी;
वो तितिली जो परे उडती थी;
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो ग़जल-ए-कलाम थी,
खुदा-ए-पैगाम थी;
ख़ुद ही जो अपने को पढ़ती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो झूमर-ए-पायल थी,
कभी रूह-ए-घायल थी ;
नौंक-ए-ख़ंजर जो चुभोती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो सूरज-ए-रौशनी थी,
कभी आसमां-ए-चांदनी थी;
बादल-ए-नक़ाब में छुपती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो जेवरात-ए-चमक थी,
एक गहना-ए-दमक थी;
सुनी गर्दन जो एक ताविज पहनती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो रंग-ए-सांवली थी ,
कभी कमसिन-ए-बावली थी;
खयालो में ही जो शर्माती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो इंकार-ए-दायरा थी,
जाड़ों का शाम-ए-मुशायरा थी;
जो "शायरी मोम" से पिघलती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो मिलो-ए-फासला थी,
पर बुलंद-ए-हौसला थी;
हर जुस्तजू जो पाति थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो उम्मीद-ए-अमन थी,
एक आँचल-ए-दामन थी;
दुपट्टा जो छाओंती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो लभ-ए-किनारे तिल थी,
गहेरी मंजर-ए-झील थी;
कश्ती जो कभी न डूबती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो शेहेर-ए-पनघट थी;
एक हया-ए-घूँघट थी;
एक अदब,जो कातिल-ए-झुकती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो रेत-ए-साहिल थी,
कहीं रौनक-ए-मैफिल थी;
वो शमा जो, अदाओं से पिघलती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो दिल-ए-हसरत थी,
जो ख़ुदा-ए-फितरत थी;
आप ही में दुआ-ए-मन्नत थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

वो शराब-ए-जाम थी,
नजराती क़त्ल-ए-आम थी;
मल्लिका-ए-मौसिकी जो झूमती थी,
एक मुस्कान,जो होठो किनारे थमती थी....

चारुदत्त अघोर (ता.१२/२/११)

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