ॐ साईं.
"कभी-कभी."
न जाने एक हुक सी उठती है सांसों में कभी,
कुछ गहेरी टीस सी चुभती है सिने में कभी;
न ज़िन्दगी से हमें कोई गुमा थी कभी,
पिघलती है नजरों में शमा सी कभी;
कतरा कतरा नब्ज़ का बहाता है ख्वाहिशें कभी,
जेहें दिमाग उड़ाता हैं ख्यालों की आतिशें कभी;
हर अदा उनकी बनाती थी हमें दीवाना कभी,
घूँघट से हुस्न-ऐ-रौशनी बनाती थी परवाना कभी;
अब निगाहें ढूंडति है उन्हें के वो मिलेंगे कभी,
सुखी नज़र लौटती है की पलकें गिलेंगी कभी,
किस राह पे चले हम के कारवां मिले कभी,
किसी को तो सुनाएँ बीते प्यार के सिलसिलें कभी;
रुखी हिना महेकती थी उन हथेलियों पे कभी,
सूंघकर चुमते हम मूंद के पलक-पुतलियों से कभी;
कंगनों की धुंदली आवाज से हम उठते थे झनक कभी,
जिस्म की हर नब्ज़ में थिरक उठती थी खनक कभी;
खुले बालों से बहती थी फूलों की महक कभी,
दो पाओं कदमते ही चाल जो भरती थी देहेक कभी;
वो नुकीला सुरमा जो करता था हमें घायल कभी,
जाग उठते सोये हम जब बजती थी पायल कभी;
मोड़ के गिलौरी होंठ्ती थी पान कभी,
लभों किनारे बहेती लाली जो लेती थी जान कभी;
झरोके से पूछती उस चाँद से सवालों के जवाब कभी,
क्या ख़ुशनसीब ऐ ख़ुदा हम,के बने उन्ही के शौहर-ऐ-नवाब कभी;
किस हद्द तक बर्दाश्त करें ये जुदाई जो रूह करती है परेशान कभी,
या परवरदिगार मिला नजरें उनसे, के हो उठे अदब-ऐ-एहेसान कभी..!!!!!
चारुदत्त अघोर(ता.१७/२/११)
"कभी-कभी."
न जाने एक हुक सी उठती है सांसों में कभी,
कुछ गहेरी टीस सी चुभती है सिने में कभी;
न ज़िन्दगी से हमें कोई गुमा थी कभी,
पिघलती है नजरों में शमा सी कभी;
कतरा कतरा नब्ज़ का बहाता है ख्वाहिशें कभी,
जेहें दिमाग उड़ाता हैं ख्यालों की आतिशें कभी;
हर अदा उनकी बनाती थी हमें दीवाना कभी,
घूँघट से हुस्न-ऐ-रौशनी बनाती थी परवाना कभी;
अब निगाहें ढूंडति है उन्हें के वो मिलेंगे कभी,
सुखी नज़र लौटती है की पलकें गिलेंगी कभी,
किस राह पे चले हम के कारवां मिले कभी,
किसी को तो सुनाएँ बीते प्यार के सिलसिलें कभी;
रुखी हिना महेकती थी उन हथेलियों पे कभी,
सूंघकर चुमते हम मूंद के पलक-पुतलियों से कभी;
कंगनों की धुंदली आवाज से हम उठते थे झनक कभी,
जिस्म की हर नब्ज़ में थिरक उठती थी खनक कभी;
खुले बालों से बहती थी फूलों की महक कभी,
दो पाओं कदमते ही चाल जो भरती थी देहेक कभी;
वो नुकीला सुरमा जो करता था हमें घायल कभी,
जाग उठते सोये हम जब बजती थी पायल कभी;
मोड़ के गिलौरी होंठ्ती थी पान कभी,
लभों किनारे बहेती लाली जो लेती थी जान कभी;
झरोके से पूछती उस चाँद से सवालों के जवाब कभी,
क्या ख़ुशनसीब ऐ ख़ुदा हम,के बने उन्ही के शौहर-ऐ-नवाब कभी;
किस हद्द तक बर्दाश्त करें ये जुदाई जो रूह करती है परेशान कभी,
या परवरदिगार मिला नजरें उनसे, के हो उठे अदब-ऐ-एहेसान कभी..!!!!!
चारुदत्त अघोर(ता.१७/२/११)

Nigahen dundati hai ki aaogemkabhi
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